संक्षेप में रामायण-कथा-
हिन्दू
शास्त्रों के अनुसार भगवान राम, विष्णु के अवतार थे। इस अवतार का उद्देश्य मृत्युलोक
में मानवजाति को आदर्श जीवन के लिये मार्गदर्शन देना था। अन्ततः श्रीराम ने राक्षस
जाति के राजा रावण का वध किया और धर्म की पुनर्स्थापना की।
बालकाण्ड-
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अयोध्या
नगरी में दशरथ नाम के राजा हुये जिनकी कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा नामक पत्नियाँ थीं।
सन्तान प्राप्ति हेतु अयोध्यापति दशरथ ने अपने गुरु श्री वशिष्ठ की आज्ञा से पुत्रकामेष्टि
यज्ञ करवाया[3]जिसे कि ऋंगी ऋषि ने सम्पन्न किया। भक्तिपूर्ण आहुतियाँ पाकर अग्निदेव
प्रसन्न हुये और उन्होंने स्वयं प्रकट होकर राजा दशरथ को हविष्यपात्र (खीर, पायस) दिया
जिसे कि उन्होंने अपनी तीनों पत्नियों में बाँट दिया। खीर के सेवन के परिणामस्वरूप
कौशल्या के गर्भ से राम का, कैकेयी के गर्भ से भरत का तथा सुमित्राके गर्भ से लक्ष्मण
और शत्रुघ्न का जन्म हुआ।
सीता स्वंयवर
-
राजकुमारों के
बड़े होने पर आश्रम की राक्षसों से रक्षा हेतु ऋषि विश्वामित्र राजा दशरथ सेराम और
लक्ष्मण को मांग कर अपने साथ ले गये। राम ने ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षसों को मार
डाला और मारीच को बिना फल वालेबाण से मार कर समुद्र के पार भेज दिया। उधर लक्ष्मण ने
राक्षसों की सारी सेना का संहार कर डाला। धनुषयज्ञ हेतु राजा जनक के निमन्त्रण मिलने
पर विश्वामित्र राम औरलक्ष्मण के साथ उनकी नगरी मिथिला(जनकपुर) आ गये। रास्ते में राम
ने गौतममुनि की स्त्री अहल्या का उद्धार किया।मिथिला में राजा जनक की पुत्री सीता जिन्हें
कि जानकी के नाम से भी जाना जाता है कास्वयंवर का भी आयोजन था जहाँ किजनकप्रतिज्ञा
के अनुसार शिवधनुष को तोड़ कर राम ने सीता से विवाह किया। राम औरसीता के विवाह के साथ
ही साथ गुरु वशिष्ठ नेभरत का माण्डवी से, लक्ष्मण का उर्मिला से और शत्रुघ्न का श्रुतकीर्ति
से करवा दिया।
अयोध्याकाण्ड-
मुख्य लेख : अयोध्याकाण्ड
राम के विवाह
के कुछ समय पश्चात् राजा दशरथ ने राम का राज्याभिषेक करना चाहा। इस पर देवता लोगों
को चिन्ता हुई कि राम को राज्य मिल जाने पर रावण का वध असम्भव हो जायेगा। व्याकुल होकर
उन्होंने देवी सरस्वती से किसी प्रकार के उपाय करने की प्रार्थना की। सरस्वती नें मन्थरा,
जो कि कैकेयी की दासी थी, की बुद्धि को फेर दिया। मन्थरा की सलाह से कैकेयी कोपभवन
में चली गई। दशरथ जब मनाने आये तोकैकेयी ने उनसे वरदान मांगे कि भरत को राजा बनाया
जाये और राम को चौदह वर्षों के लिये वनवास में भेज दिया जाये।
राम के साथ सीता
और लक्ष्मण भी वन चले गये। ऋंगवेरपुर में निषादराज गुह ने तीनों की बहुत सेवा की। कुछ
आनाकानी करने के बाद केवट ने तीनों को गंगा नदी के पार उतारा। प्रयाग पहुँच कर राम
ने भरद्वाजमुनि से भेंट की। वहाँ से राम यमुना स्नान करते हुये वाल्मीकि ऋषि के आश्रम
पहुँचे। वाल्मीकि से हुई मन्त्रणा के अनुसार राम, सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में निवास
करने लगे।
अयोध्या में पुत्र
के वियोग के कारण दशरथ का स्वर्गवास हो गया। वशिष्ठ ने भरत और शत्रुघ्न को उनके ननिहाल
से बुलवा लिया। वापस आने पर भरत ने अपनी माता कैकेयी की, उसकी कुटिलता के लिये, बहुत
भर्तस्ना की और गुरुजनों के आज्ञानुसार दशरथ की अन्त्येष्टि क्रिया कर दिया। भरत ने
अयोध्या के राज्य को अस्वीकार कर दिया और राम को मना कर वापस लाने के लिये समस्त स्नेहीजनों
के साथ चित्रकूट चले गये।कैकेयी को भी अपने किये पर अत्यन्त पश्चाताप हुआ। सीता के
माता-पिता सुनयना एवं जनक भीचित्रकूट पहुँचे। भरत तथा अन्य सभी लोगों ने राम के वापस
अयोध्या जाकर राज्य करने का प्रस्ताव रखा जिसे कि राम ने, पिता की आज्ञा पालन करने
और रघुवंश की रीति निभाने के लिये, अमान्य कर दिया।
भरत अपने स्नेही
जनों के साथ राम की पादुका को साथ लेकर वापस अयोध्या आ गये। उन्होंने राम की पादुका
को राज सिंहासन पर विराजित कर दिया स्वयं नन्दिग्राम में निवास करने लगे।
अरण्यकाण्ड-
मुख्य लेख : अरण्यकाण्ड
कुछ काल के पश्चात
राम ने चित्रकूट से प्रयाण किया तथा वे अत्रि ऋषि के आश्रम पहुँचे। अत्रि ने राम की
स्तुति की और उनकी पत्नी अनसूया ने सीता को पातिव्रत धर्म के मर्म समझाये। वहाँ से
फिर राम ने आगे प्रस्थान किया और शरभंग मुनि से भेंट की। शरभंग मुनि केवल राम के दर्शन
की कामना से वहाँ निवास कर रहे थे अतः राम के दर्शनों की अपनी अभिलाषा पूर्ण हो जाने
से योगाग्नि से अपने शरीर को जला डाला औरब्रह्मलोक को गमन किया। और आगे बढ़ने पर राम
को स्थान स्थान पर हड्डियों के ढेर दिखाई पड़े जिनके विषय में मुनियों ने राम को बताया
कि राक्षसों ने अनेक मुनियों को खा डाला है और उन्हीं मुनियों की हड्डियाँ हैं। इस
पर राम ने प्रतिज्ञा की कि वे समस्त राक्षसों का वध करके पृथ्वी को राक्षस विहीन कर
देंगे। राम और आगे बढ़े और पथ में सुतीक्ष्ण, अगस्त्य आदि ऋषियों से भेंट करते हुये
दण्डक वन में प्रवेश किया जहाँ पर उनकी मुलाकात जटायु से हुई। राम ने पंचवटी को अपना
निवास स्थान बनाया।
सीता हरण -
पंचवटी में रावण
की बहन शूर्पणखा ने आकरराम से प्रणय निवेदन-किया। राम ने यह कह कर कि वे अपनी पत्नी
के साथ हैं और उनका छोटा भाई अकेला है उसे लक्ष्मण के पास भेज दिया। लक्ष्मण ने उसके
प्रणय-निवेदन को अस्वीकार करते हुये शत्रु की बहन जान कर उसके नाक और कान काट लिये।
शूर्पणखा नेखर-दूषण से सहायता की मांग की और वह अपनी सेना के साथ लड़ने के लिये आ गया।
लड़ाई में राम ने खर-दूषण और उसकी सेना का संहार कर डाला। शूर्पणखा ने जाकर अपने भाई
रावण से शिकायत की। रावण ने बदला लेने के लिये मारीच को स्वर्णमृग बना कर भेजा जिसकी
छाल की मांग सीता ने राम से की। लक्ष्मण को सीता के रक्षा की आज्ञा दे कर राम स्वर्णमृग
रूपी मारीच को मारने के लिये उसके पीछे चले गये। मारीच के हाथों मारा गया पर मरते मरते
मारीच ने राम की आवाज बना कर ‘हा लक्ष्मण’ का क्रन्दन किया जिसे सुन कर सीता ने आशंकावश होकरलक्ष्मण को राम
के पास भेज दिया। लक्ष्मणके जाने के बाद अकेली सीता का रावण ने छलपूर्वक हरण कर लिया
और अपने साथ लंका ले गया। रास्ते में जटायु ने सीता को बचाने के लिये रावण से युद्ध
किया और रावण ने उसके पंख काटकर उसे अधमरा कर दिया।
सीता को न पा
कर राम अत्यन्त दुखी हुये और विलाप करने लगे। रास्ते में जटायु से भेंट होने पर उसने
रामको रावण के द्वारा अपनी दुर्दशा होने व सीता को हर कर दक्षिण दिशा की ओर ले जाने
की बात बताई। ये सब बताने के बाद जटायु ने अपने प्राण त्याग दिये और राम उसका अन्तिम
संस्कार करके सीता की खोज में सघन वन के भीतर आगे बढ़े। रास्ते में राम ने दुर्वासा
के शाप के कारण राक्षस बने गन्धर्व कबन्ध का वध करके उसका उद्धार किया और शबरी के आश्रम
जा पहुँचे जहाँ पर कि उसके द्वारा दिये गये झूठे बेरों को उसके भक्ति के वश में होकर
खाया। इस प्रकार राम सीता की खोज में सघन वन के अंदर आगे बढ़ते गये।
किष्किन्धाकाण्ड-
मुख्य लेख : किष्किन्धाकाण्ड
राम ऋष्यमूक पर्वत
के निकट आ गये। उस पर्वत पर अपने मन्त्रियों सहित सुग्रीव रहता था। सुग्रीव ने, इस
आशंका में कि कहीं बालि ने उसे मारने के लिये उन दोनों वीरों को न भेजा हो, हनुमान
को राम और लक्ष्मण के विषय में जानकारी लेने के लिये ब्राह्मण के रूप में भेजा। यह
जानने के बाद कि उन्हें बालि ने नहीं भेजा हैहनुमान ने राम और सुग्रीव में मित्रता
करवा दी। सुग्रीव ने राम को सान्त्वना दी कि जानकी जी मिल जायेंगीं और उन्हें खोजने
में वह सहायता देगा साथ ही अपने भाई बालि के अपने ऊपर किये गये अत्याचार के विषय में
बताया। राम ने बालि का छलपूर्वक वध कर के सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य तथा बालि
के पुत्र अंगद को युवराज का पद दे दिया।
राज्य प्राप्ति
के बाद सुग्रीव विलास में लिप्त हो गया और वर्षा तथा शरद् ऋतु व्यतीत हो गई। राम के
नाराजगी पर सुग्रीव ने वानरों को सीता की खोज के लिये भेजा। सीता की खोज में गये वानरों
को एक गुफा में एक तपस्विनी के दर्शन हुये। तपस्विनी ने खोज दल को योगशक्ति से समुद्रतट
पर पहुँचा दिया जहाँ पर उनकी भेंट सम्पाती से हुई। सम्पाती ने वानरों को बताया कि रावण
ने सीता को लंका अशोकवाटिका में रखा है। जाम्बवन्त ने हनुमान को समुद्र लांघने के लिये
उत्साहित किया।
सुंदरकाण्ड-
मुख्य लेख : सुंदरकाण्ड
हनुमान ने लंका
की ओर प्रस्थान किया। सुरसा ने हनुमान की परीक्षा ली और उसे योग्य तथा सामर्थ्यवान
पाकर आशीर्वाद दिया। मार्ग में हनुमान ने छाया पकड़ने वाली राक्षसी का वध किया और लंकिनी
पर प्रहार करके लंका में प्रवेश किया। उनकी विभीषण से भेंट हुई। जब हनुमान अशोकवाटिका
में पहुँचे तो रावण सीताको धमका रहा था। रावण के जाने पर त्रिजटा ने सीता को सान्तवना
दी। एकान्त होने पर हनुमान ने सीता से भेंट करके उन्हें राम की मुद्रिका दी। हनुमान
ने अशोकवाटिका का विध्वंस करके रावण के पुत्र अक्षय कुमारका वध कर दिया। मेघनाथ हनुमान
को नागपाश में बांध कर रावण की सभा में ले गया। रावण के प्रश्न के उत्तर में हनुमान
ने अपना परिचय राम के दूत के रूप में दिया। रावण ने हनुमान की पूँछ में तेल में डूबा
हुआ कपड़ा बांध कर आग लगा दिया इस पर हनुमान ने लंका का दहन कर दिया।
हनुमान सीता के
पास पहुँचे। सीता ने अपनी चूड़ामणि दे कर उन्हें विदा किया। वे वापस समुद्र पार आकर
सभी वानरों से मिले और सभी वापस सुग्रीव के पास चले गये। हनुमान के कार्य से राम अत्यन्त
प्रसन्न हुये।राम वानरों की सेना के साथ समुद्रतट पर पहुँचे। उधर विभीषण ने रावण को
समझाया कि राम से बैर न लें इस पर रावण ने विभीषण को अपमानित कर लंका से निकाल दिया।
विभीषण राम के शरण में आ गया औरराम ने उसे लंका का राजा घोषित कर दिया। राम ने समुद्र
से रास्ता देने की विनती की। विनती न मानने परराम ने क्रोध किया और उनके क्रोध से भयभीत
होकर समुद्र ने स्वयं आकर राम की विनती करने के पश्चात्नल और नील के द्वारा पुल बनाने
का उपाय बताया।
लंकाकाण्ड (युद्धकाण्ड
मुख्य लेख : लंकाकाण्ड
जाम्बवन्त के
आदेश से नल-नील दोनों भाइयों ने वानर सेना की सहायता से समुद्र पर पुल बांध दिया। श्रीराम
ने श्री रामेश्वर की स्थापना करके भगवान शंकर की पूजा की और सेना सहित समुद्र के पार
उतर गये। समुद्र के पार जाकर राम ने डेरा डाला। पुल बंध जाने और राम के समुद्र के पार
उतर जाने के समाचार सेरावण मन में अत्यन्त व्याकुल हुआ। मन्दोदरी के राम से बैर न लेने
के लिये समझाने पर भी रावण का अहंकार नहीं गया। इधर राम अपनी वानरसेना के साथ सुबेल
पर्वत पर निवास करने लगे। अंगद राम के दूतबन कर लंका में रावण के पास गये और उसे राम
के शरण में आने का संदेश दिया किन्तु रावण ने नहीं माना।
शान्ति के सारे
प्रयास असफल हो जाने पर युद्ध आरम्भ हो गया। लक्ष्मण और मेघनाद के मध्य घोर युद्ध हुआ।
शक्तिबाण के वार से लक्ष्मण मूर्क्षित हो गये। उनके उपचार के लिये हनुमान सुषेण वैद्य
को ले आये और संजीवनी लाने के लिये चले गये। गुप्तचर से समाचार मिलने पर रावण ने हनुमान
के कार्य में बाधा के लिये कालनेमि को भेजा जिसका हनुमान ने वध कर दिया। औषधि की पहचान
न होने के कारण हनुमान पूरे पर्वत को ही उठा कर वापस चले। मार्ग में हनुमान को राक्षस
होने के सन्देह में भरत ने बाण मार कर मूर्क्षित कर दिया परन्तु यथार्थ जानने पर अपने
बाण पर बिठा कर वापस लंका भेज दिया। इधर औषधि आने में विलम्ब देख कर राम प्रलाप करने
लगे। सही समय पर हनुमान औषधि लेकर आ गये और सुषेण के उपचार से लक्ष्मण स्वस्थ हो गये।
रावण ने युद्ध
के लिये कुम्भकर्ण को जगाया। कुम्भकर्ण ने भी रावण के शरण में जाने की असफल मन्त्रणा
दी। युद्ध में कुम्भकर्ण ने राम के हाथों परमगति प्राप्त की। लक्ष्मण ने मेघनाद से
युद्ध करके उसका वध कर दिया। राम और रावण के मध्य अनेकों घोर युद्ध हुये और अन्त में
रावण राम के हाथों मारा गया। विभीषण को लंका का राज्य सौंप कर राम सीता और लक्ष्मण
के साथ पुष्पकविमान पर चढ़ कर अयोध्या के लिये प्रस्थान किया।
उत्तरकाण्ड-
मुख्य लेख : उत्तरकाण्ड
उत्तरकाण्ड राम
कथा का उपसंहार है। सीता, लक्ष्मण और समस्त वानरसेना के साथ राम अयोध्या वापस पहुँचे।
राम का भव्य स्वागत हुआ, भरत के साथ सर्वजनों में आनन्द व्याप्त हो गया। वेदों और शिव
की स्तुति के साथ राम का राज्याभिषेक हुआ। अभ्यागतों की विदाई दी गई। राम ने प्रजा
को उपदेश दिया और प्रजा ने कृतज्ञता प्रकट की। चारों भाइयों के दो दो पुत्र हुये। रामराज्य
एक आदर्श बन गया।
उपरोक्त बातों
के साथ ही साथ गोस्वामी तुलसीदास जी ने उत्तरकाण्ड में श्री राम-वशिष्ठ संवाद, नारद
जी का अयोध्या आकर रामचन्द्र जी की स्तुति करना, शिव-पार्वती संवाद, गरुड़ मोह तथा
गरुड़ जी काकाकभुशुण्डि जी से रामकथा एवं राम-महिमा सुनना, काकभुशुण्डि जी के पूर्वजन्म
की कथा, ज्ञान-भक्ति निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्ति की महान महिमा, गरुड़ के सात प्रश्न
और काकभुशुण्डि जी के उत्तर आदि विषयों का भी विस्तृत वर्णन किया है।
जहाँ तुलसीदास
जी ने उपरोक्त वर्णन लिखकर रामचरितमानस को समप्त कर दिया है वहीं आदिकवि वाल्मीकि अपने
रामायण में उत्तरकाण्ड में रावण तथा हनुमान के जन्म की कथा, सीता का निर्वासन,राजा
नृग, राजा निमि, राजा ययाति तथा रामराज्य में कुत्ते का न्याय की उपकथायें, लवकुश का
जन्म, राम के द्वारा अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान तथा उस यज्ञ में उनके पुत्रों लव तथा
कुश के द्वारा महाकवि वाल्मिक रचित रामायण गायन, सीता का रसातल प्रवेश, लक्ष्मण का
परित्याग, 515 518 का भी वर्णन किया है। वाल्मीकि रामायण में उत्तरकाण्ड का समापन राम
के महाप्रयाण के बाद ही हुआ है।
रामायण की सीख-
रामायण के सारे
चरित्र अपने धर्म का पालन करते हैं।
राम एक आदर्श
पुत्र हैं। पिता की आज्ञा उनके लिये सर्वोपरि है। पति के रूप में राम ने सदैव एकपत्नीव्रत
का पालन किया। राजा के रूप में प्रजा के हित के लिये स्वयं के हित को हेय समझते हैं।
विलक्षण व्यक्तित्व है उनका। वे अत्यन्त वीर्यवान, तेजस्वी, विद्वान, धैर्यशील, जितेन्द्रिय,
बुद्धिमान, सुंदर, पराक्रमी, दुष्टों का दमन करने वाले, युद्ध एवं नीतिकुशल, धर्मात्मा,
मर्यादापुरुषोत्तम, प्रजावत्सल, शरणागत को शरण देने वाले, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता
एवं प्रतिभा सम्पन्न हैं।
सीता का पातिव्रत
महान है। सारे वैभव और ऐश्ववर्य को ठुकरा कर वे पति के साथ वन चली गईं।
रामायण भातृ-प्रेम
का भी उत्कृष्ट उदाहरण है। जहाँ बड़े भाई के प्रेम के कारण लक्ष्मण उनके साथ वन चले
जाते हैं वहीं भरत अयोध्या की राज गद्दी पर, बड़े भाई का अधिकार होने के कारण, स्वयं
न बैठ करराम की पादुका को प्रतिष्ठित कर देते हैं।
कौशल्या एक आदर्श
माता हैं। अपने पुत्र राम पर कैकेयी के द्वारा किये गये अन्याय को भुला कर वेकैकेयी
के पुत्र भरत पर उतनी ही ममता रखती हैं जितनी कि अपने पुत्र राम पर।
हनुमान एक आदर्श
भक्त हैं, वे राम की सेवा के लिये अनुचर के समान सदैव तत्पर रहते हैं। शक्तिबाणसे मूर्छित
लक्ष्मण को उनकी सेवा के कारण ही प्राणदान प्राप्त होता है।
रावण के चरित्र
से सीख मिलती है कि अहंकार नाश का कारण होता है।
रामायण के चरित्रों
से सीख लेकर मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
रामायण द्वारा
प्रेरित अन्य साहित्यिक महाकाव्य-
वाल्मीकि रामायण
से प्रेरित होकर सन्त तुलसीदास ने रामचरितमानस जैसे महाकाव्य की रचना की जो किवाल्मीकि
के द्वारा संस्कृत में लिखे गये रामायण का हिंदी संस्करण है। रामचरितमानस में हिंदू
आदर्शों का उत्कृष्ट वर्णन है इसीलिये इसे हिंदू धर्म के प्रमुख ग्रंथ होने का श्रेय
मिला हुआ है और प्रत्येक हिंदू परिवार में भक्तिभाव के साथ इसका पठन पाठन किया जाता
है।
रामायण से ही
प्रेरित होकर मैथिलीशरण गुप्त ने पंचवटी तथा साकेत नामक खंडकाव्यों की रचना की। रामायण
में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के उल्लेखनीय त्याग को शायद भूलवश अनदेखा कर दिया गया
है और इस भूल को साकेत खंडकाव्य रचकर मैथिलीशरण गुप्त जी ने सुधारा है।
इनके अलावा और
भी अनेक साहित्यकारों ने रामायण से प्रेरणा ले कर अनेक कृतियों की रचना की है।
atyant mahatvapurn jankari hai.
जवाब देंहटाएंpadhkar accha laga.
good try.
जवाब देंहटाएंbhut sunder vivek ji
जवाब देंहटाएंbhahu sobhanam
जवाब देंहटाएंbahu shobhanam
जवाब देंहटाएंramayan ki samany jankari k liye upyogi h...kripaya ramayan k sabhi patro ka parichay uplabdh karayen .mahan upkar hoga
जवाब देंहटाएंयावत् स्थास्यन्ति गिरय:,सरितश्च महीतले।
जवाब देंहटाएंतावद् रामाय़णकथा लोकेषु प्रचरिष्यति॥
dhanyvad
जवाब देंहटाएंdhanyvad
जवाब देंहटाएंYou can have the name of text in the URL. Keep it updated
जवाब देंहटाएंश्लाघनीय,प्रशंसनीय,अनुकरणीय एवं एक सार्थक प्रयास।भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं के संवर्धन हेतु एक समुपयोगी मञ्च।
जवाब देंहटाएं